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मधुराष्टकम्

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  अधरं   मधुरं   वदनं   मधुरं   नयनं   मधुरं   हसितं   मधुरम्  । हृदयं   मधुरं   गमनं   मधुरं   मधुराधिपतेरखिलं   मधुरम्  ॥१॥ वचनं   मधुरं   चरितं   मधुरं   वसनं   मधुरं   वलितं   मधुरम्  । चलितं   मधुरं   भ्रमितं   मधुरं   मधुराधिपतेरखिलं   मधुरम्  ॥२॥ वेणुर्मधुरो   रेणुर्मधुरः   पाणिर्मधुरः   पादौ   मधुरौ  । नृत्यं   मधुरं   सख्यं   मधुरं   मधुराधिपतेरखिलं   मधुरम्  ॥३॥ गीतं   मधुरं   पीतं   मधुरं   भुक्तं   मधुरं   सुप्तं   मधुरम्  । रूपं   मधुरं   तिलकं   मधुरं   मधुराधिपतेरखिलं   मधुरम्  ॥४॥ करणं   मधुरं   तरणं   मधुरं   हरणं   मधुरं   रमणं   मधुरम्  । वमितं   मधुरं   शमितं   मधुरं   मधुराधिपतेरखिलं   मधुरम्  ॥५॥ गुञ्जा   मधुरा   माला ...

पाण्डुरङ्गाष्टकम्

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  महायोगपीठे   तटे   भीमरथ्यां वरं   पुण्डरीकाय   दातुं   मुनीन्द्रैः  । समागत्य   तिष्ठन्तमानन्दकन्दं परब्रह्मलिङ्गं   भजे   पाण्डुरङ्गम्  ॥१॥ हिन्दी  शब्दार्थ: महायोगपीठे: महान योगपीठ (पंढरपुर) पर। तटे भीमरथ्यां: भीमा नदी के तट पर। वरं पुण्डरीकाय दातुं: भक्त पुण्डलीक को वरदान देने के लिए। मुनीन्द्रैः समागत्य: श्रेष्ठ मुनियों के साथ आकर। तिष्ठन्तमानन्दकन्दं: जो स्थित हैं और जो आनंद की जड़ (पुंज) हैं। परब्रह्मलिङ्गं: साक्षात् परब्रह्म के प्रतीक स्वरूप। भजे पाण्डुरङ्गम्: उन श्री पांडुरंग की मैं भक्ति करता हूँ। भावार्थ: जो भीमा नदी के तट पर स्थित महायोगपीठ में विराजमान हैं, जो भक्त पुण्डलीक को वरदान देने के लिए श्रेष्ठ मुनियों के साथ यहाँ पधारे हैं, जो आनंद के मूल स्रोत हैं और जो निराकार परब्रह्म के साकार स्वरूप हैं, उन भगवान पांडुरंग को मैं भजता हूँ। ગુજરાતી  શબ્દાર્થ: महायोगપીઠે: મહાન યોગપીઠ (પંઢરપુર) પર. તટે ભીમરથ્યાં: ભીમા નદીના કાંઠે. વરં પુણ્ડરીકાય દાતું: ભક્ત પુંડલીકને વરદાન આપવા માટે. મુનીન્દ્રૈઃ સમાગત્ય: ...